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Wednesday, 25 December 2013

Chamunda Mandir- Shakti Peeth-चामुंडा मंदिर- शक्तिपीठ


हिन्दू श्रद्धालुओं का मुख्य केंद्र और 51 शक्तिपीठों में एक चामुंडा देवी देव भूमि हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित है. बानेर नदी के तट पर बसा यह मंदिर महाकाली को समर्पित है. पौराणिक कथाओं के अनुसार जब भगवान शंकर माता सती को अपने कंधे पर उठाकर घूम रहे थे, तब इसी स्थान पर माता का चरण गिर पड़ा था और माता यहां शक्तिपीठ रूप में स्थापित हो गई. चामुंडा देवी मंदिर भगवान शिव और शक्ति का स्थान है. भक्तों में मान्यता है कि यहां पर शतचंडी का पाठ सुनना और सुनाना श्रेष्ठकर है और इसे सुनने और सुनाने वाले का सारा क्लेश दूर हो जाता है.
दुर्गा सप्तशती के सप्तम अध्याय में वर्णित कथाओं के अनुसार एक बार चण्ड-मुण्ड नामक दो महादैत्य देवी से युद्ध करने आए तो, देवी ने काली का रूप धारण कर उनका वध कर दिया. माता देवी की भृकुटी से उत्पन्न कलिका देवी ने जब चण्ड-मुण्ड के सिर देवी को उपहार स्वरुप भेंट किए तो देवी भगवती ने प्रसन्न होकर उन्हें वर दिया कि तुमने चण्ड -मुण्ड का वध किया है, अतः आज से तुम संसार में चामुंडा के नाम से विख्यात हो जाओगी. मान्यता है कि इसी कारण भक्तगण देवी के इस स्वरुप को चामुंडा रूप में पूजते हैं.
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Hindu shraddhaluo ka mukhya kendra aur 51 shaktipitho me ek Chamunda Devi dev bhumi Himachal Pradesh ke Kangda zile me sthit hai. Baner Nadi ke tat par basa yah mandir Mahakali ko samarpit hai. Pauranik kathao ke anusar jab Bhagvan Shankar Mata Sati ko apne kandhe par uthakar ghum rahe the, tab isi sthan par mata ka charan gir pada tha aur mata yaha shaktipith roop me sthapit ho gayi. Chamunda Devi Mandir Bhagvan Shiv aur Shakti ka sthan hai. Bhakto me manyata hai ki yaha par Shatchandi ka path karna sunana aur sunaana shreshthkar hai aur ise sunane aur sunane wale ka sara klesh door ho jata hai.
Durga Saptshati ke saptam adhyaay me varnit kathao ke anusar ek bar Chand-Mund namak do mahadaitya Devi se yuddh karne aaye to, Devi ne Kali ka roop dharan kar unka vadh kar diya. Mata Devi ki bhrikuti se utpann Kalika Devi ne jab Chand-Mund ke sir Devi ko uphar swaroop bhent kiye to Devi Bhagvati prasann hokar unhe var diya ki tumne Chand-Mund ka vadh kiya hai, atah aaj se tum sansar me Chamunda ke naam se vikhyat ho jaaogi. Manyata hai ki isi karan bhaktgan Devi ke is swaroop ko Chamunda roop me poojte hain.



शहर :कांगड़ा
राज्य :हिमाचल प्रदेश
क्षेत्र :उत्तर भारत

Wednesday, 23 October 2013

Jai Mata Di G

मैया जी के चरणों मे ठिकाना चाहिए |
बेटा जो बुलाए माँ को आना चाहिए ||

Sunday, 13 October 2013

●►माता जी के अन्यन भक्तो , आज नौवें दिन माँ सिद्धिदात्री की पूजा का विधान है.

                          ●►माता जी के अन्यन भक्तो , आज नौवें दिन माँ सिद्धिदात्री की पूजा का विधान है.









दुर्गा मईया जगत के कल्याण हेतु नौ रूपों में प्रकट हुई और इन रूपों में अंतिम रूप है देवी सिद्धिदात्री माता का, जय माता दी

देवी प्रसन्न होने पर सम्पूर्ण जगत की रिद्धि सिद्धि अपने भक्तों को प्रदान करती हैं. देवी सिद्धिदात्री का रूप अत्यंत सौम्य है, देवी की चार भुजाएं हैं दायीं भुजा में माता ने चक्र और गदा धारण किया है, मां बांयी भुजा में शंख और कमल का फूल है.
मां सिद्धिदात्री कमल आसन पर विराजमान रहती हैं, मां की सवारी सिंह हैं. देवी ने सिद्धिदात्री का यह रूप भक्तों पर अनुकम्पा बरसाने के लिए धारण किया है. देवतागण, ऋषि-मुनि, असुर, नाग, मनुष्य सभी मां के भक्त हैं. देवी जी की भक्ति जो भी हृदय से करता है मां उसी पर अपना स्नेह लुटाती हैं.
●►मां का ध्यान करने के लिए आप“सिद्धगन्धर्वयक्षाघरसुरैरमरैरपि सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी..” इस मंत्र से स्तवन कर सकते हैं.........
शेयर करे ताकि आपकी वजह से कोई और भगत भी माँ का नाम ले सके
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HAPPY DASARA TO ALL

May goddess Durga destroy all evil around you and
Fill your life with happiness and prosperity

HAPPY DASARA TO ALL

There are two important stories behind celebration of Dussehra festival in India. One story is associated with Lord Ram and another is associated with Goddess Durga. The festival of Dussehra signifies the victory of good over evil. Read on to know more about the significance and celebration of Dussehra festival.

Dasara  also known as Vijaya Dashami, Dashahara, Navaratri, Durgotdsav… is one of the very important & fascinating festivals of India.

Word DASARA is derived from Sanskrit words “Dasha” & “hara” meaning removing the ten (10). This is the most auspicious festival in the Dakshinaayana or in the Southern hemisphere motion of the Sun.   In Sanskrit, 'Vijaya' means Victory and 'Dashami' means 10th day.

Dussehra is also called Vijayadashami and is celebrated as victory of Goddess Durga over the demon Mahisasura.

In Hindu scriptures, Mahishasura was an asura.

Mahishasura's father Rambha was king of the asuras, and he once fell in love with a water buffalo (Princess Shyamala, cursed to be a buffalo); Mahishasura was born out of this union. He is, therefore, able to change between human and buffalo form at will (mahisha is Sanskrit word for buffalo).
The Devas and Asuras often wage wars against each other. In one such war, Rambha was killed by Indra. As Mahishasura grew up, he came to know how his father died. He collected a band of loyal soldiers and started terrorising Heaven (Swarga Loka). He invaded heaven, defeating Indra, and drove all the Devas out of heaven. Thus his revenge was complete.
The Devas formed a conclave to decide how to defeat this invincible asura. Since he was invincible to all men, they created his nemesis in the form of a young woman, Durga (a form of Shakti or Parvati). She combined the powers of all the devas in a beautiful form. After that, she marched against the demons on her mount, the Lion (wrongly depicted as a Tiger).

Mahishasura, upon hearing about her, sent his army to defeat and capture her. Durga kills all of the demons and challenges Mahishasura to a one-to-one fight. After nine days of fierce fighting (Mahishasura gave Durga a stiff opposition, as legend says of Durga re-gaining her spent energy by drinking honey), Durga finally manages to kill the powerful Mahishasura on the tenth day of the waxing moon. Durga is, therefore, called Mahishasuramardini (literally the slayer of the buffalo demon), the destroyer of Mahishasura.

Friday, 11 October 2013

2. चामुंडा देवी


हिन्दू श्रद्धालुओं का मुख्य केंद्र और 51 शक्तिपीठों में एक चामुंडा देवी देव भूमि हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित है. बानेर नदी के तट पर बसा यह मंदिर महाकाली को समर्पित है. पौराणिक कथाओं के अनुसार जब भगवान शंकर माता सती को अपने कंधे पर उठाकर घूम रहे थे, तब इसी स्थान पर माता का चरण गिर पड़ा था और माता यहां शक्तिपीठ रूप में स्थापित हो गई. चामुंडा देवी मंदिर भगवान शिव और शक्ति का स्थान है. भक्तों में मान्यता है कि यहां पर शतचंडी का पाठ सुनना और सुनाना श्रेष्ठकर है और इसे सुनने और सुनाने वाले का सारा क्लेश दूर हो जाता है.
दुर्गा सप्तशती के सप्तम अध्याय में वर्णित कथाओं के अनुसार एक बार चण्ड-मुण्ड नामक दो महादैत्य देवी से युद्ध करने आए तो, देवी ने काली का रूप धारण कर उनका वध कर दिया. माता देवी की भृकुटी से उत्पन्न कलिका देवी ने जब चण्ड-मुण्ड के सिर देवी को उपहार स्वरुप भेंट किए तो देवी भगवती ने प्रसन्न होकर उन्हें वर दिया कि तुमने चण्ड -मुण्ड का वध किया है, अतः आज से तुम संसार में चामुंडा के नाम से विख्यात हो जाओगी. मान्यता है कि इसी कारण भक्तगण देवी के इस स्वरुप को चामुंडा रूप में पूजते हैं.

●►7 मां दुर्गा के सातवें स्वरूप या शक्ति को कालरात्रि


शेयर करें। पुण्य के भागीदार बने
वाम पादोल्ल सल्लोहलता कण्टक भूषणा |
वर्धन मूर्ध ध्वजा कृष्णा कालरात्रि भर्यङ्करी ||
दुर्गा पूजा के सप्तमी तिथि को मां कालरात्रि की पूजा वंदना इस मंत्र से करना चाहिए.
नवरात्री की सप्तमी तिथि को आदिशक्ति दुर्गा की 9 शक्तियों की सातवीं स्वरूपा और अन्धकार का नाश कर प्रकाश प्रदान करने वाली मां कालरात्रि की पूजा होती है. भय का विनाश करने वाली और काल से अपने भक्तों की रक्षा करने वाली मां कालरात्रि का स्वरुप बड़ा ही भयानक है, लेकिन ये शरणागतों को सदैव शुभ फल देनेवाली मानी जाती है, जिस कारण माता को शुभंकरी भी कहा जाता है. लौकिक स्वरुप में माता के शरीर का रंग अमावस्या रात की तरह एकदम काला है. सिर के बाल बिखरे हैं. इनके तीन नेत्र हैं जो ब्रह्माण्ड के समान सदृश्य गोल है. गले में विद्युत् की तरह चमकने वाली माला है. इनकी नासिका से अग्नि की भयंकर ज्वाला निकलती रहती है. दुर्गा पूजा में सप्तमी की पूजा का बड़ा महत्व होता है क्योंकि देवी का यह रूप सिद्धि प्रदान करने वाला है. यह दिन तांत्रिक क्रिया की साधना करने वाले भक्तों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है. शास्त्रानुसार इस दिन पहले कलश की पूजा करनी चाहिए, फिर नवग्रह, दशदिक्पाल, माता के परिवार में उपस्थित देवी-देवताओं और फिर माता कालरात्रि की पूजा करनी चाहिए. इससे भक्तों को मनोवांछित फल मिलता है.
जय माता दी

माँ आपकी मनोकामना पूर्ण करे ।

Thursday, 10 October 2013

श्रीदुर्गाष्टोत्तार्शत्ननाम्स्त्रोतम


श्रीदुर्गाष्टोत्तार्शत्ननाम्स्त्रोतम
शंकर जी पार्वती जी से कहते हैं ---कमलानने ! अष्टोत्तरशत नाम का वर्णन करता हूँ , सुनो I जिसके प्रसाद (पाठ या श्रवण ) मात्र से परम साध्वी भगवती दुर्गा प्रसन्न हो जाती है II
१ ॐ सती
२ साध्वी
३ भवप्रीता (भगवान शिव पर प्रीति रखनेवाली )
४ भवानी
५ भवमोचनी(संसार बंधन से मुक्त करने वाली )
६ आर्या
७ दुर्गा
८ जया
९ आद्या
१० त्रिनेत्रा
११ शूलधारिणी
१२ पिनाकधारिणी
१३ चित्रा
१४ चंडघण्टा
१५ महातपा:(भरी तपस्या करने वाली )
१६ मन: (मनन - शक्ति)
१७ बुद्धि: (बोधशक्ति )
१८ अहंकारा (अहंता का आश्रय )
१९ चित्तरूपा
२०चिता
२१ चिति:(चेतना )
२२ सर्व- मन्त्र मयी
२३ सत्ता (सत् -स्वरूपा )
२४ सत्यानन्दस्वरूप्नी
२५ अनन्ता (जिस्केस्वरूप कहीं अंत नहीं )
२६ भाविनी(सबको उत्पन्न करने वाली )
२७ भाव्या ( भावना एवं ध्यान करने योग्य )
२८ भव्या ( कल्याणरूपा )
२९ अभव्या ( जिस बढ कर भव्य कहीं है नहीं )
३० सदा -गति:
३१ शाम्भवी (शिव प्रिय )
३२ देव माता
३३ चिंता
३४ रत्न प्रिया
३५सर्व विद्या
३६ दक्ष कन्या
३७ दक्ष यज्ञविनाशनी
३८ अपर्णा ( तपस्या के समय पत्तों को भी न खाने वाली )
३९ अनेक वर्णा (अनेक रंगों वाली)
४० पाटला (लाल रंग वाली )
४१ पाटलावती ( गुलाब के फूल या लाल फूल धारण करने वाली )
४२ पट्टाम्बर परिधारना ( रेशमी वस्त्र पहनने वाली )
४३ कल मंज्ज़िर रंज्जनी ( मदुर धवनी करने वाले मंज्ज़िर को धारण करके प्रसन्न रहने वाली )
४४ अमेयविक्रमा ( असीम परक्रमवाली )
४५ क्रूरा ( दैत्यों के प्रति कठोर )
४६ सुंदरी
४७ सुरसुन्दरी
४८ वनदुर्गा
४९ मात न्ड्गी
५० मतंगमुनि पूजिता
५१ ब्राह्मी
५२ माहेश्वरी
५३ ऐन्द्री
५४ कौमारी
५५ वैष्णवी
५६ चामुंडा
५७ वाराही
५८ लक्ष्मी:
५९ पुरुषाकृति :
६० विमला
६१ उत्कर्शिनी
६२ ज्ञाना
६४ नित्या
६५ बुद्धिदा
६६ बहुला
६७ बहुलप्रेमा
६८ सर्ववहानवाहना
६९ निशुम्भशुम्भहननी
७० महिषासुरमर्दिनी

७१ मधुकैटभह्न्त्री
७२ चंडमुंडविनाशनी
७३ सर्वासुरविनाशा
७४ सर्वदानवघातिनी
७५ सर्वशास्त्र्मायी
७६ सत्या
७७ सर्वास्त्रधारिणी
७८ अनेकशास्त्रहस्ता
७९ अनेकास्त्रधारिणी
८० कुमारी
८१ एक कन्या
८२ कैशौरी
८३ युवती
८४ यति:
८५ अप्रौढा
८६ प्रौढ़ा
८७ वृद्दमाता
८८ बलप्रदा
८९ महोदरी
९० मुक्तकेशी
९१ घोररूपा
९२ महाबली
९३ अग्निज्वाला
९४ रौद्रमुखी
९५ कालरात्रि:
९६ तपस्वनी
९७ नारायणी
९८ भद्रकाली
९९ विष्णुमाया
१०० जलोदरी
१०१ शिवदूती
१०२ कराली
१०३ अनन्ता ( विनाशरहिता )
१०४ परमेश्वरी
१०५ कत्यानी
१०६ सावित्री
१०७ प्रत्यक्षा
१०८ ब्रह्मवादिनी
• जो भगवती दुर्गा के इन 108 नामों का नित्य पाठ करता है उसके लिए तीनों लोकों में कुछ भी असाध्य (अप्राप्य)नहीं रहता । इस लोक में रहते हुए वह धन ,धान्य,पुत्र,अश्व एवं हाथी आदि ऐश्वर्य का भोग करते हुए धर्म ,अर्थ , काम व मोक्ष को प्राप्त करता है तथा अन्त में शाश्वत (नित्य) मुक्ति को प्राप्त होता है ।

●►माँ दुर्गा के छठे रूप को माँ कात्यायनी

                                            ●►माँ दुर्गा के छठे रूप को माँ कात्यायनी 
 


●►माँ दुर्गा के छठे रूप को माँ कात्यायनी के नाम से पूजा जाता है. महर्षि कात्यायन की कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर उनकी इच्छानुसार उनके यहां पुत्री के रूप में पैदा हुई थीं. महर्षि कात्यायन ने इनका पालन-पोषण किया तथा महर्षि कात्यायन की पुत्री और उन्हीं के द्वारा सर्वप्रथम पूजे जाने के कारण देवी दुर्गा को कात्यायनी कहा गया.
देवी कात्यायनी अमोद्य फलदायिनी हैं इनकी पूजा अर्चना द्वारा सभी संकटों का नाश होता है, माँ कात्यायनी दानवों तथा पापियों का नाश करने वाली हैं. देवी कात्यायनी जी के पूजन से भक्त के भीतर अद्भुत शक्ति का संचार होता है. इस दिन साधक का मन ‘आज्ञा चक्र’ में स्थित रहता है. योग साधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है. साधक का मन आज्ञा चक्र में स्थित होने पर उसे सहजभाव से मां कात्यायनी के दर्शन प्राप्त होते हैं. साधक इस लोक में रहते हुए अलौकिक तेज से युक्त रहता है.
माँ कात्यायनी का स्वरूप अत्यन्त दिव्य और स्वर्ण के समान चमकीला है. यह अपनी प्रिय सवारी सिंह पर विराजमान रहती हैं. इनकी चार भुजायें भक्तों को वरदान देती हैं, इनका एक हाथ अभय मुद्रा में है, तो दूसरा हाथ वरदमुद्रा में है अन्य हाथों में तलवार तथा कमल का फूल है.

●►देवी कात्यायनी के मंत्र :
चन्द्रहासोज्जवलकरा शाईलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी।।
या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कात्यायनी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

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Tuesday, 8 October 2013

●►माँ दुर्गा का पंचम रूप स्कन्दमाता

●►माँ दुर्गा का पंचम रूप स्कन्दमाता
●►माँ दुर्गा का पंचम रूप स्कन्दमाता के रूप में जाना जाता है. भगवान स्कन्द कुमार ( कार्तिकेय )की माता होने के कारण दुर्गा जी के इस पांचवे स्वरूप को स्कंद माता नाम प्राप्त हुआ है. भगवान स्कन्द जी बालरूप में माता की गोद में बैठे होते हैं इस दिन साधक का मन विशुध्द चक्र में अवस्थित होता है. स्कन्द मातृस्वरूपिणी देवी की चार भुजायें हैं, ये दाहिनी ऊपरी भुजा में भगवान स्कन्द को गोद में पकडे हैं और दाहिनी निचली भुजा जो ऊपर को उठी है, उसमें कमल पकडा हुआ है। माँ का वर्ण पूर्णतः शुभ्र है और कमल के पुष्प पर विराजित रहती हैं। इसी से इन्हें पद्मासना की देवी और विद्यावाहिनी दुर्गा देवी भी कहा जाता है। इनका वाहन भी सिंह है|
माँ स्कंदमाता सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी हैं| इनकी उपासना करने से साधक अलौकिक तेज की प्राप्ति करता है | यह अलौकिक प्रभामंडल प्रतिक्षण उसके योगक्षेम का निर्वहन करता है| एकाग्रभाव से मन को पवित्र करके माँ की स्तुति करने से दुःखों से मुक्ति पाकर मोक्ष का मार्ग सुलभ होता है|
●►स्कन्दमाता की मंत्र :
सिंहासना गता नित्यं पद्माश्रि तकरद्वया |
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी ||
या देवी सर्वभू‍तेषु माँ स्कंदमाता रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

Monday, 7 October 2013

●►चतुर्थ नवरात्र : ●►देवी कूष्माण्डा

khushmanda…Kusmanda is the fourth phase of the mother Durga. (Ku+Usma+Anda) - that is how the word has been derived. 'Ku' means 'a little'; 'Usma' is warmth, heat or energy and 'Anda' means the cosmic egg or universe. That is from whose fraction of warmth the universe has emanated. So she is justifiably named Kusmanda.
When there was only a void full of darkness, at that time, when even time was not there, the mother Kusmanda created the universe with herSankalpa as a mental projection. Before her advent there was neitherSat nor Asat.
She has her abode in the inner portion of Surya-Loka. Only she could live there and no one else. The hue and luster of her body also is just like that of the Sun glowing and effulgent, incomparable with any other god or goddess-herself being her own match. All the ten quarters are illuminated with her effulgence. Whatever brilliance is observed in the world-in living beings or objects is simply a reflection of her splendor.
She has eight arms. So Astbhuja the name. In her seven hands she holds Kamandalu,bow, arrow, lotus, a jar of nectar, discus, mace, respectively. In her eighth hand there is rosary capable of giving eight Siddhis and nine Nidhis. Her vehicle is lion. Kusmanda in Sanskrit stands for pumpkin, which she likes most as a sacrificial offer. So also she is Kusmanda.
On the fourth day of Navratra, Kusmanda is worshipped. This day the mind of the striver enters and stays in Anahata Cakra. So the striver is required to meditate on this aspect of the Mother with a steady mind and worship her single-mindedly. As a result of her worship the devotees get rid of all ailments and sorrows. The life span, name, strength and health are on the increase. The mother Kusmanda is easy to propitiate. If some body surrenders before her guilelessly, he is sure to reach her Supreme abode.
We should worship her in befitting manner prescribed in the Sastras and be a true devotee of her. Later on the striver has unearthly perceptions and he feels her grace. This miserable world transforms for him into a divine place. Her worship is the best and easiest means to cross the mire of the world. So an aspirant should worship her for his mundane as well as spiritual success.
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Sunday, 6 October 2013

3 . श्री चंद्रघंटा : Maa Chandra Ghanta

जय माता दी , Jai Mata Di
नवरात्र पर्व के तीसरे दिन आज माँ चंद्रघंटा की पूजा-अर्चना की जा रही है।

पिण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकेर्युता। प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता॥

देवी का यह स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है। इस देवी की कृपा से साधक को अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं। दिव्य सुगंधियों का अनुभव होता है और कई तरह की ध्वनियां सुनाई देने लगती हैं। इस देवी के मस्तक पर घंटे के आकार का आधा चंद्र है। इसीलिए इस देवी को चंद्रघंटा कहा गया है। इनके शरीर का रंग सोने के समान बहुत चमकीला है। इस देवी के दस हाथ हैं। वे खड्ग और अन्य अस्त्र-शस्त्र से विभूषित हैं। सिंह पर सवार इस देवी की मुद्रा युद्ध के लिए उद्धत रहने की है। इसके घंटे सी भयानक ध्वनि से अत्याचारी दानव-दैत्य और राक्षस काँपते रहते हैं। नवरात्रि में तीसरे दिन इसी देवी की पूजा का महत्व है। इस देवी की कृपा से साधक को अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं। दिव्य सुगंधियों का अनुभव होता है और कई तरह की ध्वनियां सुनाईं देने लगती हैं। इन क्षणों में साधक को बहुत सावधान रहना चाहिए। इस देवी की आराधना से साधक में वीरता और निर्भयता के साथ ही सौम्यता और विनम्रता का विकास होता है। यह देवी कल्याणकारी है। इसलिए हमें चाहिए कि मन, वचन और कर्म के साथ ही काया को विहित विधि-विधान के अनुसार परिशुद्ध-पवित्र करके चंद्रघंटा के शरणागत होकर उनकी उपासना-आराधना करना चाहिए। इससे सारे कष्टों से मुक्त होकर सहज ही परम पद के अधिकारी बन सकते हैं। नवरात्रि में तीसरे दिन इसी देवी की पूजा का महत्व है। इसीलिए कहा जाता है कि हमें निरंतर उनके पवित्र विग्रह को ध्यान में रखकर साधना करना चाहिए। उनका ध्यान हमारे इहलोक और परलोक दोनों के लिए कल्याणकारी और सद्गति देने वाला है।

माता रानी का बेटा राकेश मिश्रा

2 . श्री ब्रह्मचारिणी Sri Brahmacharini

दुर्गा पूजा के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा-वंदना इस मंत्र द्वारा की जाती है.

दधाना कर पद्माभ्यामक्ष माला कमण्डलु |
देवी प्रसीदतु मणि ब्रह्मचारिणीय नुत्तमा ||

Saturday, 5 October 2013

Shailputri : शैलपुत्री

दुर्गा पूजा के प्रथम दिन माता शैलपुत्री की पूजा-वंदना इस मंत्र द्वारा की जाती है.

वंदे वाद्द्रिछतलाभाय चंद्रार्धकृतशेखराम |
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्री यशस्विनीम्‌ ||

मां दुर्गा की पहली स्वरूपा और शैलराज हिमालय की पुत्री शैलपुत्री के पूजा के साथ ही दुर्गा पूजा आरम्भ हो जाता है. नवरात्र पूजन के प्रथम दिन कलश स्थापना के साथ इनकी ही पूजा और उपासना की जाती है. माता शैलपुत्री का वाहन वृषभ है, उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प रहता है. नवरात्र के इस प्रथम दिन की उपासना में योगी अपने मन को 'मूलाधार' चक्र में स्थित करते हैं और यहीं से उनकी योग साधना प्रारंभ होता है. पौराणिक कथानुसार मां शैलपुत्री अपने पूर्व जन्म में प्रजापति दक्ष के घर कन्या रूप में उत्पन्न हुई थी. उस समय माता का नाम सती था और इनका विवाह भगवान् शंकर से हुआ था. एक बार प्रजापति दक्ष ने यज्ञ आरम्भ किया और सभी देवताओं को आमंत्रित किया परन्तु भगवान शिव को आमंत्रण नहीं दिया. अपने मां और बहनों से मिलने को आतुर मां सती बिना निमंत्रण के ही जब पिता के घर पहुंची तो उन्हें वहां अपने और भोलेनाथ के प्रति तिरस्कार से भरा भाव मिला. मां सती इस अपमान को सहन नहीं कर सकी और वहीं योगाग्नि द्वारा खुद को जलाकर भस्म कर दिया और अगले जन्म में शैलराज हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया. शैलराज हिमालय के घर जन्म लेने के कारण मां दुर्गा के इस प्रथम स्वरुप को शैल पुत्री कहा जाता है.